Sunday, 23 February 2020

लोकतंत्र गरिमा को गिराने वाला है,राजनेताओं का भाषाई आचरण · ........ श्याम यादव




विगत कुछ दिनों से भारतीय राजनीति में खासकर संसद के अंदर और संसद के बाहर हमारे राजनेताओं द्वारा जिस तरह की भाषा का उपयोग किया जा रहा है वह ना तो उनकी मर्यादा के अनुकूल है और ना ही ऐसी भाषा इन राजनेताओं  को शोभा देती  है ऐसा लग रहा है  इन सभी राजनेताओं में चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के अपने बयानों में भाषा की मर्यादा को लांघने में एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं।
भारतीय राजनीति में ऐसा नहीं है कि सत्ता और विपक्ष के बीच  संसद और संसद के बाहर आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाये गये हो या यूँ  कहा जाय कि शब्दों की जंग होना कोई नई बात नहीं है l पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गांधी से ले कर वर्तमान प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी तक ये जंग जारी है . फर्क सिर्फ इतना है कि स्वस्थ आलोचना और गाली-गलौज में अंतर कुछ अपवादों को छोड़ कर  सभी राजनेता लगभग भूल चुके हैं।अब शब्दों की मर्यादा के साथ साथ पद की गरिमा भी गिराई जा रही है . इस कृत्य में दोनों ही दल शामिल है . संसद के बाहर जन सभाओं  के साथ साथ संसद के अंदर भी इस तरह का अमर्यादित भाषा का उपयोग करना क्या दर्शाता  है ?
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश के राजनेताओं का यह आचरण और भाषा,हमारे लोकतंत्र को  भले ही सीधे तौर पर  कोई  नुकसान  न पहुचाये परंतु हमारी सभ्यता  और संस्कृति को पतन की ओर जरूर ले जा रहा है .ऐसा नही है कि राजनीति में पहली बार इस तरह कि स्तरहीन भाषा का उपयोग किया जा रहा है इससे पहले भी  इस तरह की भाषाए उपयोग में लाई गयी है  मगर उनका उपयोग बहुत निचले स्तर  वाले राजनेताओं या कार्यकर्ताओं तक ही सीमित थी । आज की तरह किसी भी दल के किसी भी  शीर्ष  राजनेता के मुंह से इस तरह की  भाषा कभी भी नही निकली थी । राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के चलते उपयोग की जा रही इस भाषा से भले ही हास परिहास का अवसर उपजता हो ,इन शब्दों को ले कर एक दूसरे को उपहास उड़ाने का मौका बनता हो पर इस तरह का आचरण क्या राजनीती में एक कडवाहट नहीं घोलता ? नेताओं के अनुनाई इस तरह के उपहास पर निचले स्तर पर कैसे इन शब्दों का उपयोग करते है ये भी देखा जाना चाहिए .हमारे समाजिक ताने-बाने को तोड़ने में, आपसी  कटुता पैदा करने में ये शब्द सहायक बन जाते है । कांग्रेस के राहुल गांधी को “पप्पू“ और प्रधानमंत्री मोदी को “फेंकू”जैसे शब्दों की उपाधी को देश देख चुका है . निश्चित ही प्रधानमंत्री किसी पार्टी का सदस्य होता है .ठीक है ,मगर वह प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है वह किसी दल का नही होता ,ऐसे में देश के प्रधानमत्री का उपहास रचना देश का उपहास करना होता है . हाल ही में डंडे पड़ेंगे जैसे शब्दों  का उपयोग उनके लिए करना प्रधानमंत्री की गरिमा को ठोस पहुंचाना है .मगर मर्यादा तो सबके लिए समान होती है। प्रधानमंत्री को  भी शायद अपनी पार्टी का प्रचार करते समय  यह याद नही रहता होगा कि वे पार्टी के साथ साथ देश के भी प्रधानमंत्री है और दूसरे दल के नेता को भी सम्मान  देना भूल जाते होंगे ।जैसा  कि दिया जाना चाहिए . ट्यूब लाईट जैसे बयान भी देश के प्रधानमत्री को  भी शोभा नही देता .लोगों से हास  परिहास में कुछ भी कह देना अलग बात है पर सार्वजानिक तौर और संसद में ऐसा कहना उनकी भी  गरिमा के अनुकूल नही है । यह गंभीर विषय है कि राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के लिए वैचारिक स्तर पर हमारे राजनेता चाहे वे सत्ता पक्ष के या विपक्ष के  किस धरातल पर आ गये ? इन नेताओं का ऐसा व्यवहार सामाज  पर क्या असर डालेगा इसकी परिकल्पना कीजिये ! एक स्वस्थ लोकतंत्र देश  को राजनेताओं की यह भाषा की फूहड़ता,या विदूषकपन पतन की किस राह पर ले जाएगा यह तो कहा नही जा सकता . पर इतना जरुर कह सकते है ये लोकतंत्र के लिए अच्छा नही है l राजनेताओं का ऐसा भाषाई आचरण लोकतंत्र की गरिमा को गिराने वाला ही कहा जाएगा ।


 

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