Monday, 30 November 2015

सुखद है मोदी का प्रधानमंत्री में परिवर्तित हो जाना


आखिर ऐसा क्या हुआ कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में एक नए रूप में नज़र आये . प्रचंड बहुमत के साथ काबिज हुए मोदी ने सहमत  को लेकर चलने की बात देश के प्रधानमंत्री के रूप में बात  की . क्या बिहार चुनाव में आशा के विपरीत आई हार से मोदी बदल गये या उसके बाद  मध्यप्रदेश में  एक संसदीय सीट पर हुई पार्टी की हार ने उन्हें  इसलिए डरा दिया की आने वाले राज्यों में भी  हार का ये सिलसिला बरकरार न रहे .
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ये सवाल हर एक के मन में उठना स्वाभाविक है . और इसका उत्तर भी अपने हिसाब और सुविधा से लोग ढूढ़ ही लेंगे .कांग्रेस की ओर सहमति के लिए  उनका हाथ बढाना हो सकता है उनकी ही पार्टी के कुछ आला नेताओं को न भाये मगर ऐसा कर कर मोदी देश के प्रधानमंत्री की पद की गरिमा को साकार कर गये . राज्यसभा में पार्टी का बहुमत न होने को भी इसका कारण  माना जा सकता है . वर्षाकालीन सत्र की तरह ये सत्र भी यूँ ही न गुजर जाए इसके लिए किसी न किसी को तो पहल करना ही थी .हालांकि लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन संसद को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सांसदों को पत्र भेज कर एक शुरुआत कर चुकी थीं  और प्रधानमंत्री ने उससे आगे आ  कर जो अपना नया स्वरूप संसद और दुनिया को दिखाया है उससे तो ये सन्देश ही जाता है की अब संसद में गतिरोध की गुंजाईश ही नही है और देश विकास की ओर आगे बढने को तैयार है ,वह भी सबको साथ ले कर .यदि इसमें कोई  गतिरोध आता है तो उसके लिए वे जवाबदेह नही है .
ये हो या नही हो मगर संविधान को ले कर दो दिन तक संसद में चली बहस के बाद जिसने भी नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री  के रूप  में परिवर्तित होते देखा वो भारतीय लोकतंत्र के लिए सुखद था .प्रधानमंत्री के रूप में उनका संबोधन संसद ही नही देश के  उन करोडो लोगों को भी  छू गया ,जो उनके मुरीद नही थे . आम आदमी को जिसने भी मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखा ,सुना और पढ़ा उसे लगने लगा की ये ही तो है  हमारा प्रधानमंत्री . अभी  तक वे जिस नरेन्द्र मोदी को सुनते और देखते आये है वो महज एक चुनाव प्रचारक  और भारतीय जनता पार्टी का  तेज तर्रार वाक् चातुर्य   नेता भर  ही था .
वास्तव में प्रधानमंत्री बनते ही सबका विकास और सबका साथ कि जिस अवधारणा के साथ मोदी ने देश की बागडोर संभाली थी उसका अमली करण का नया अध्याय तो शुरू हुआ है . पिछले अठारह महीनों के विदशी  दौरों  के बाद अपनी योजनाओं को धरातल पर लाने का सिलसिला अब सही मायने में शुरू होगा . चाहे वह स्वछता अभियान हो या डिजिटल इण्डिया . कांग्रेस भले ही लोकसभा में अल्पमत हो पर लेकिन बीजेपी भी तो  राज्यसभा में ऐसी ही स्थिति में है . इस कारण ही मोदी को बहुमत की जगह सर्वमत की बात कहना पडी . राजनैतिक प्रतिद्वंदता ,या वैचारिक मतभिन्नता होना लाजमी है मगर देश हित में अपने हित छोड़ कर पुरानी गलतियों को छोड़ना ही समझदारी है . मोदी के साथ साथ कांग्रेस भी  इस ओर अग्रसर है . पी चिदम्बर का इमरजेंसी को गलत ठहराना इस ओर पहला कदम कहा  जा सकता है .
बिहार में मोदी का जादू नही चला ये कह कर सियासी हलकों में खुशी मनाई जा सकती है ,मगर मोदी  ने संसद में अपने आप को परिवर्तित कर है  जिस तरह से प्रस्तुत  किया है उससे बिहार ही और देश में ही नही  दूनिया में मोदी का जादू चल गया है .
प्रधानमंत्री के रूप में जिस गरिमा के साथ मोदी नए रूप में अवतरित हुए है उसे बनाये रखने के लिए मोदी को अनेक अडचनों को पार भी करना होगा . खुद उनकी ही पार्टी और उनके हिन्दू वादी संगठनों के गैर जरुरी बयानों पर लगाम लगाना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी . संविधान में परिवर्तन नही होगा ये कह कर उन्होंने ये सन्देश तो दे ही दिया है कि वे राजनैतिक तौर पर किसी पार्टी के सदस्य हो सकते है मगर प्रधानमंत्री तो देश के ही  है और ऐसे देश के जिसमे सवा अरब  लोग रहते है और भी  विभिन्न धर्म और पंथ को मामने वाले .
 श्याम यादव



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