Sunday, 23 February 2020

लोकतंत्र गरिमा को गिराने वाला है,राजनेताओं का भाषाई आचरण · ........ श्याम यादव




विगत कुछ दिनों से भारतीय राजनीति में खासकर संसद के अंदर और संसद के बाहर हमारे राजनेताओं द्वारा जिस तरह की भाषा का उपयोग किया जा रहा है वह ना तो उनकी मर्यादा के अनुकूल है और ना ही ऐसी भाषा इन राजनेताओं  को शोभा देती  है ऐसा लग रहा है  इन सभी राजनेताओं में चाहे वे सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के अपने बयानों में भाषा की मर्यादा को लांघने में एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं।
भारतीय राजनीति में ऐसा नहीं है कि सत्ता और विपक्ष के बीच  संसद और संसद के बाहर आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाये गये हो या यूँ  कहा जाय कि शब्दों की जंग होना कोई नई बात नहीं है l पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गांधी से ले कर वर्तमान प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी तक ये जंग जारी है . फर्क सिर्फ इतना है कि स्वस्थ आलोचना और गाली-गलौज में अंतर कुछ अपवादों को छोड़ कर  सभी राजनेता लगभग भूल चुके हैं।अब शब्दों की मर्यादा के साथ साथ पद की गरिमा भी गिराई जा रही है . इस कृत्य में दोनों ही दल शामिल है . संसद के बाहर जन सभाओं  के साथ साथ संसद के अंदर भी इस तरह का अमर्यादित भाषा का उपयोग करना क्या दर्शाता  है ?
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश के राजनेताओं का यह आचरण और भाषा,हमारे लोकतंत्र को  भले ही सीधे तौर पर  कोई  नुकसान  न पहुचाये परंतु हमारी सभ्यता  और संस्कृति को पतन की ओर जरूर ले जा रहा है .ऐसा नही है कि राजनीति में पहली बार इस तरह कि स्तरहीन भाषा का उपयोग किया जा रहा है इससे पहले भी  इस तरह की भाषाए उपयोग में लाई गयी है  मगर उनका उपयोग बहुत निचले स्तर  वाले राजनेताओं या कार्यकर्ताओं तक ही सीमित थी । आज की तरह किसी भी दल के किसी भी  शीर्ष  राजनेता के मुंह से इस तरह की  भाषा कभी भी नही निकली थी । राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के चलते उपयोग की जा रही इस भाषा से भले ही हास परिहास का अवसर उपजता हो ,इन शब्दों को ले कर एक दूसरे को उपहास उड़ाने का मौका बनता हो पर इस तरह का आचरण क्या राजनीती में एक कडवाहट नहीं घोलता ? नेताओं के अनुनाई इस तरह के उपहास पर निचले स्तर पर कैसे इन शब्दों का उपयोग करते है ये भी देखा जाना चाहिए .हमारे समाजिक ताने-बाने को तोड़ने में, आपसी  कटुता पैदा करने में ये शब्द सहायक बन जाते है । कांग्रेस के राहुल गांधी को “पप्पू“ और प्रधानमंत्री मोदी को “फेंकू”जैसे शब्दों की उपाधी को देश देख चुका है . निश्चित ही प्रधानमंत्री किसी पार्टी का सदस्य होता है .ठीक है ,मगर वह प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है वह किसी दल का नही होता ,ऐसे में देश के प्रधानमत्री का उपहास रचना देश का उपहास करना होता है . हाल ही में डंडे पड़ेंगे जैसे शब्दों  का उपयोग उनके लिए करना प्रधानमंत्री की गरिमा को ठोस पहुंचाना है .मगर मर्यादा तो सबके लिए समान होती है। प्रधानमंत्री को  भी शायद अपनी पार्टी का प्रचार करते समय  यह याद नही रहता होगा कि वे पार्टी के साथ साथ देश के भी प्रधानमंत्री है और दूसरे दल के नेता को भी सम्मान  देना भूल जाते होंगे ।जैसा  कि दिया जाना चाहिए . ट्यूब लाईट जैसे बयान भी देश के प्रधानमत्री को  भी शोभा नही देता .लोगों से हास  परिहास में कुछ भी कह देना अलग बात है पर सार्वजानिक तौर और संसद में ऐसा कहना उनकी भी  गरिमा के अनुकूल नही है । यह गंभीर विषय है कि राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के लिए वैचारिक स्तर पर हमारे राजनेता चाहे वे सत्ता पक्ष के या विपक्ष के  किस धरातल पर आ गये ? इन नेताओं का ऐसा व्यवहार सामाज  पर क्या असर डालेगा इसकी परिकल्पना कीजिये ! एक स्वस्थ लोकतंत्र देश  को राजनेताओं की यह भाषा की फूहड़ता,या विदूषकपन पतन की किस राह पर ले जाएगा यह तो कहा नही जा सकता . पर इतना जरुर कह सकते है ये लोकतंत्र के लिए अच्छा नही है l राजनेताओं का ऐसा भाषाई आचरण लोकतंत्र की गरिमा को गिराने वाला ही कहा जाएगा ।


 

Monday, 7 August 2017

कश्मीर पर अप्रत्याशित फैसला कर सकती है मोदी सरकार !....· श्याम यादव


 नोटबंदी जैसे अप्रत्याशित फैसले करके देश को चौकानें वाली केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार आगामी दिनों में भी कुछ ऐसे फैसले कर सकती है जिन पर अन्य राजनीतिक पार्टियां ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लोग भी अचंभित रह सकते हैं I नरेंद्र मोदी की यह सरकार जब सत्ता में आई थी तब से ही यह कयास लगाए जाने लगे थे कि अब वह जिन हिंदुत्व वादी मुद्दों को सामने रखकर सत्ता में काबिज हुई है वे सभी मुद्दे अपनी हिंदूवादी छवि के चलते मोदी सरकार हल कर देगी I सबका साथ सबका विकास का मुद्दा लेकर चली मोदी सरकार ने जहां विकास को प्राथमिकता दी, वहीं अपनी हिंदुत्व वाली छवि को भी बरकरार रखते हुए निश्चित ही शुरू के 2 सालों में सरकार ने परिस्थितियों को भांपने  और समझने में अपना समय व्यतीत किया तो  वही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की एक अलग छवि निर्मित करने की कोशिश में दुनिया का  कूटनीतिक दौरा  भी प्रधानमंत्री द्वारा किया गया जिससे उन्हें विदेशी दौरा वाला प्रधानमंत्री तक कहा गया I
गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव में अपने तीन प्रमुख मुद्दों के साथ जनता के बीच में थी यह मुद्दे थे राम मंदिर का निर्माण ,कश्मीर से धारा 370 हटाना और विदेशों में जमा काला धन बाहर लाना तथा भ्रष्टाचार पर काबू पानाI लोकसभा के चुनाव में अप्रत्याशित बहुमत पा कर सत्ता पर काबिज हुई मोदी सरकार ने शुरू के 2 सालों में इन मुद्दों पर कुछ किया यह प्रत्यक्ष  रूप से सामने नहीं आया, लेकिन ऐसा नहीं है कि सरकार इन मुद्दों पर चुप बैठी रही I लोकसभा में बहुमत के बावजूद राज्यसभा में बहुमत का इंतजार करना सरकार की मजबूरी के साथ एक सोची-समझी नीति थी I बावजूद इसके जब सरकार को लगा कि अब कड़े फैसले लिए जाना चाहिए तो सबसे सरल उपाय उसने नोटबंदी को आजमाकर किया I भारी अंतर्विरोधों के बावजूद नोटबंदी में सरकार कामयाब रही और करोड़ों रुपए का कालाधन जो लोगों के पास जमा था बैंकों में आ गयाI नोटबंदी जैसे अप्रत्याशित फैसले करने के बाद जिस ढंग से प्रधानमंत्री ने जनता से अपनी बात कही और उसका समर्थन उन्हें मिला उसने मोदी सरकार को बल प्रदान किया ,विदेशों में जमा काला धन भी अब शीघ्र लौटेगा इसकी उम्मीद भी  देश वासियों द्वारा की जा रही है .इस बीच पाकिस्तान की सीमा में घुस कर सर्जीकल स्ट्राईक कर सरकार ने देश को चौकाया ही नही बल्कि दुनिया में ये सन्देश भी दे दिया की भारत आतंकवाद  के खिलाफ किसी भी हदतक जा सकता है और उसे किसी की सहायता की जरुरत नही है I
मोदी सरकार के ये दोनों फैसले उस समय किये गये जब उन्हें राज्य सभा में पूर्ण बहुमत नही था , और अब जबकि सरकार ने लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में भी अपना बहुमत स्थापित कर लिया है तब वह शीघ्र ही कानूनन तरीके से कोई अप्रत्याशित फैसला भी कर सकती हैI ऐसा करने में उसे अब कोई दिक्कत भी महसूस नहीं होगी, क्योंकि तीनों संवैधानिक पदों पर उनके ही दल के व्यक्ति पदस्थ हैं, निश्चित ही ऐसा कोई कानून जो देश हित में होगा स्वीकृत करने में सरकार को कोई असुविधा नहीं होगा I
 कयास तो यह लगाए जा रहे हैं कि सरकार जिन मुद्दों को ले कर जनता से बहुमत ले कर आई थी उनमे से एक यानी अब अगला अप्रत्याशित कदम कश्मीर को लेकर ही होगाI इसके एक नही अनेक कारण है I ऐसा नहीं है कि कश्मीर में महबूबा मुफ्ती के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद सरकार चुप बैठी है भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाने के बावजूद कश्मीर के हालात से दो चार होना केंद्र के लिए  आम बात है I हाल ही में कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का वो  बयान कि कश्मीर की स्वायत्तता को छेड़ा गया तो वहां तिरंगा उठाने वाले लोग नहीं मिलेंगे, किसी ना किसी बात का संकेत करता  है कि वहां सरकार कुछ न कुछ करने जा रही है? जब बीजेपी और महबूबा की संयुक्त सरकार है तो मुख्यमंत्री को क्या वजह थी की वो ऐसा बयान  सार्वजानिक तौर पर दे I वह भी उस समय जब दहशत गर्दों के कमांडर भारतीय सेना द्वारा लगातार मारे जा रहे हैI क्या कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बन जाने के बाद भी हालात में सुधार हुआ नहीं? या मुफ्ती सरकार कश्मीर के मुद्दे पर मौन और असहायहै? गृह मंत्री राजनाथ सिंह से हुई महबूबा की हुई बार बार की बैठकों  के बाद इसे सामान्य मुलाक़ात क्यों बताया जा रहा है ?इन सवालों के जवाब के परिपेक्ष्य में यह कयास लगाये जा रहे है की केंद्र कश्मीर को ले कर कोइ बड़ा अप्रत्याशित निर्णय लेने जा रही है . वह निर्णय क्या होगा ?कैसे होगा ? मगर जानकार कयास लगा रहे है की केंद्र सरकार कभी भी कश्मीर की स्वायत्त वाले अनुच्छेद 35 (A)को हटा सकती है  I ''ये अनुच्छेद 35 (A) जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को ये अधिकार देता है कि वो 'स्थायी नागरिक' की परिभाषा तय कर सके और उनकी पहचान कर विभिन्न विशेषाधिकार भी दे सके।'', अनुच्छेद 35 (A)को हटाने की ये बात महबूबा के कानों तक भी है तभी उनका वो झंडे वाला बयान आया है I वैसे सुरक्षा बलों द्वारा जिस तरह से कश्मीर में अलगाववादी और आतंकी कमांडरों को निशाना बनाया जा रहा ही उससे भी सीमा पार से आ रहे आतंक वाद पर कमी आई है ,हालत सुधरे नही तो बिगड़े भी नही है ,स्थिर हुए हैI ये अनुच्छेद 35 (A) के बाद  इससे बदतर हालत  की उम्मीद नही की जा सकती , ''ये अनुच्छेद 35 (A )
हटाने के लिए ससंद के दोनों सदनों से कानून को पास करवाने में  अब कोई असुविधा सरकार को नही होगी .
क्‍या है धारा 35ए का मामला?
संविधान के अनुच्छेद 35 ए को 14 मई 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से संविधान में जगह मिली थी. संविधान सभा लेकर संसद की किसी भी कार्यवाही में कभी अनुच्छेद 35ए को संविधान का हिस्सा बनाने के संदर्भ में किसी संविधान संशोधन या बिल लाने का जिक्र नहीं मिलता. अनुच्छेद 35 ए को लागू करने के लिए तत्कालीन सरकार ने धारा 370 के अंतर्गत प्राप्त शक्ति का इस्तेमाल किया था.
अनुच्छेद 35ए से जम्मू-कश्मीर सरकार और वहां की विधानसभा को स्थायी निवासी की परिभाषा तय करने का मनमाना अधिकार मिल गया. इसी के साथ राज्य सरकार को ये अधिकार भी मिला कि वो आजादी के वक्त दूसरी जगहों से आए शरणार्थियों और अन्य भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में किस तरह की सहूलियतें दे अथवा नहीं दे.


Monday, 29 May 2017

सामयिकी: कांग्रेस के बस में नहीं, शिवराज को उखाड़ पाना !

सामयिकी: कांग्रेस के बस में नहीं, शिवराज को उखाड़ पाना !:                                                                                            श्याम यादव     मध्यप्रदेश में अंगद की तरह...

कांग्रेस के बस में नहीं, शिवराज को उखाड़ पाना !

                                                                                          श्याम यादव
 

 मध्यप्रदेश में अंगद की तरह पैर जमाकर बैठे शिवराज सिंह चौहान को उखाड़ फैंकने के लिए कांग्रेस के साथ साथ बीजेपी के अनेक असंतुष्ट भी कोशिश करते रहे, मगर उन्हें अभी तक तो कामयाबी नहीं मिली। नर्मदा की तलहटी में  बचपन से तैरने वाले शिवराज राजनीति के अनेक सैलाब को पार करते चले गए। दिग्विजयसिंह की सरकार को सत्ता से हटाने के साथ प्रदेश में भाजपा सरकार के 13 साल और लगातार शिवराज के 11 साल के शासन के विरोध में अब कांग्रेस कमलनाथ को बागडोर देकर अपने राजनीतिक संन्यास  को खत्म करने का दांव खेलने जा रही है। उसमें उसे कामयाबी मिल सकेगी, इसके आसार कम ही दिखाई दे रहे हैं।  
    यह तो तय है कि मध्यप्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा के चुनाव लगातार तीसरी बार सत्ता संभाल रहे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में ही भारतीय जनता पार्टी लड़ेगी! इसके पीछे कई कारण हैं। पहला यह कि आज भाजपा के पास शिवराज का विकल्प नहीं है और शिवराज अपनी अनेक लोकलुभावन योजनाओं के कारण चर्चित हैं। पार्टी में अमित शाह, नरेंद्र मोदी के साथ- साथ आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से भी उनके सम्बन्ध मधुर हैं। जो उन्हें स्थाईत्व प्रदान किए हैं। इतना ही नहीं नरेन्द्र मोदी और डॉ रमन सिंह  की तरह वे एक ही राज्य लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और यदि वे चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनते है तो ये भी एक रिकार्ड होगा। 
   मध्यप्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस 13 साल से सत्ता से बाहर है। प्रदेश में भाजपा सरकार के 13 साल पूरे होने के बाद भी एंटी-इनकंबेंसी जैसा कोई बाहरी माहौल दिखाई नहीं दे रहा! लोगों में नाराजी तो है, पर वो इतनी प्रबल नहीं कि सरकार बदल दे! हांलाकि, कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में इतनी लचर है कि अगले विधानसभा चुनाव में एंटी-इनकंबेंसी का खतरा उसे ही ज्यादा है। 2003 के विधानसभा चुनाव से 'मिशन-2018' तक प्रयोग में उलझी कांग्रेस प्रदेश के तीन दिग्गजों दिग्विजयसिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के खेमेबाजी में ऐसी उलझी कि सत्ता के गलियारे का हर दरवाजा गुटबाजी से उसे बंद ही मिला। इन सालों में कांग्रेस ने हर कोशिश की कि ये गुटबंदी खत्म हो जाए पर ज्यों ज्यों दवा की त्यों त्यों मर्ज बढ़ता ही गया कि तर्ज पर मसला ऐसा उलझता गया कि सोनिया गाँधी और राहुल गांधी भी इसे नही सुलझा पाए। 
  अब, जबकि देश के सबसे बड़े हिंदी राज्य उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बन जाने के बाद मध्यप्रदेश ही कांग्रेस को दिखाई दे रहा है कि  हां अगर बीजेपी को नहीं रोका गया तो कांग्रेस मुक्त भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्ष्य को रोकने की कोई राह  उसके पास बचेगी! लगातार तीन विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की पराजय के बाद कांग्रेस कोई चमत्कार कर पाएगी इसकी किसी को आशा नहीं है। सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया और अरुण यादव को बागडोर सौंपकर भी कांग्रेस आज वहीं पर है, जहां से चली थी ! यूँ कहा जाना बेहतर होगा कि कांग्रेस के पास शिवराज की कोई काट नहीं बची! तीन धड़ों दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों में बंटी कांग्रेस को एक करना अब आलाकामन के बस में भी नहीं है। 
   कांग्रेस की राजनीति में कमलनाथ को सबसे पुराने नेताओं में गिना जा सकता है। चार दशक पहले जब वे सक्रिय हुए, तब दिग्विजय सिंह राजनीति में नए नवेले थे और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो घुटने-घुटने ही चलना सीखा होगा! आपातकाल के दौर में संजय गाँधी के दोस्त होने के नाते वे राजनीति में आए। देश की राजनीति में इन चार दशकों में आए उतार-चढ़ाओं के बावजूद वे अब तक जमे हैं। कारण साफ़ है कि उन्होंने कभी प्रदेश की राजनीति में  कोई रूचि नहीं दिखाई। इसलिए वे सबके चहेते रहे। अभी कमलनाथ को प्रदेश की कमान सौपने की अटकले ही हैं और आपसी टांग खिचाई शुरू हो गई। यहाँ तक कि राजनीतिक गलियारों में ये भी आ गया कि कमलनाथ बीजेपी में जा रहे है जिसका कि उनकी और से खंडन भी किया गया। 
   जबकि कांग्रेस के संघटनात्मक चुनाव की प्रक्रिया प्रदेश में शुरू हो चुकी है, जो अक्तूबर के बाद तक पूरी  होगी। यानी तब तक तो कोइ परिवर्तन होना मुश्किल है। मतलब साफ़ है कि अभी शिवराज सिंह के अच्छे दिन है और आगे भी बने रहेंगे। पार्टी में उनके इतर कोई और नहीं है। जो खड़े हुए उन्हें दरकिनार कर दिया गया या प्रदेश की राजनीति से ही बाहर कर दिया गया। 
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Monday, 30 November 2015

सुखद है मोदी का प्रधानमंत्री में परिवर्तित हो जाना


आखिर ऐसा क्या हुआ कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में एक नए रूप में नज़र आये . प्रचंड बहुमत के साथ काबिज हुए मोदी ने सहमत  को लेकर चलने की बात देश के प्रधानमंत्री के रूप में बात  की . क्या बिहार चुनाव में आशा के विपरीत आई हार से मोदी बदल गये या उसके बाद  मध्यप्रदेश में  एक संसदीय सीट पर हुई पार्टी की हार ने उन्हें  इसलिए डरा दिया की आने वाले राज्यों में भी  हार का ये सिलसिला बरकरार न रहे .
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ये सवाल हर एक के मन में उठना स्वाभाविक है . और इसका उत्तर भी अपने हिसाब और सुविधा से लोग ढूढ़ ही लेंगे .कांग्रेस की ओर सहमति के लिए  उनका हाथ बढाना हो सकता है उनकी ही पार्टी के कुछ आला नेताओं को न भाये मगर ऐसा कर कर मोदी देश के प्रधानमंत्री की पद की गरिमा को साकार कर गये . राज्यसभा में पार्टी का बहुमत न होने को भी इसका कारण  माना जा सकता है . वर्षाकालीन सत्र की तरह ये सत्र भी यूँ ही न गुजर जाए इसके लिए किसी न किसी को तो पहल करना ही थी .हालांकि लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन संसद को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सांसदों को पत्र भेज कर एक शुरुआत कर चुकी थीं  और प्रधानमंत्री ने उससे आगे आ  कर जो अपना नया स्वरूप संसद और दुनिया को दिखाया है उससे तो ये सन्देश ही जाता है की अब संसद में गतिरोध की गुंजाईश ही नही है और देश विकास की ओर आगे बढने को तैयार है ,वह भी सबको साथ ले कर .यदि इसमें कोई  गतिरोध आता है तो उसके लिए वे जवाबदेह नही है .
ये हो या नही हो मगर संविधान को ले कर दो दिन तक संसद में चली बहस के बाद जिसने भी नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री  के रूप  में परिवर्तित होते देखा वो भारतीय लोकतंत्र के लिए सुखद था .प्रधानमंत्री के रूप में उनका संबोधन संसद ही नही देश के  उन करोडो लोगों को भी  छू गया ,जो उनके मुरीद नही थे . आम आदमी को जिसने भी मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखा ,सुना और पढ़ा उसे लगने लगा की ये ही तो है  हमारा प्रधानमंत्री . अभी  तक वे जिस नरेन्द्र मोदी को सुनते और देखते आये है वो महज एक चुनाव प्रचारक  और भारतीय जनता पार्टी का  तेज तर्रार वाक् चातुर्य   नेता भर  ही था .
वास्तव में प्रधानमंत्री बनते ही सबका विकास और सबका साथ कि जिस अवधारणा के साथ मोदी ने देश की बागडोर संभाली थी उसका अमली करण का नया अध्याय तो शुरू हुआ है . पिछले अठारह महीनों के विदशी  दौरों  के बाद अपनी योजनाओं को धरातल पर लाने का सिलसिला अब सही मायने में शुरू होगा . चाहे वह स्वछता अभियान हो या डिजिटल इण्डिया . कांग्रेस भले ही लोकसभा में अल्पमत हो पर लेकिन बीजेपी भी तो  राज्यसभा में ऐसी ही स्थिति में है . इस कारण ही मोदी को बहुमत की जगह सर्वमत की बात कहना पडी . राजनैतिक प्रतिद्वंदता ,या वैचारिक मतभिन्नता होना लाजमी है मगर देश हित में अपने हित छोड़ कर पुरानी गलतियों को छोड़ना ही समझदारी है . मोदी के साथ साथ कांग्रेस भी  इस ओर अग्रसर है . पी चिदम्बर का इमरजेंसी को गलत ठहराना इस ओर पहला कदम कहा  जा सकता है .
बिहार में मोदी का जादू नही चला ये कह कर सियासी हलकों में खुशी मनाई जा सकती है ,मगर मोदी  ने संसद में अपने आप को परिवर्तित कर है  जिस तरह से प्रस्तुत  किया है उससे बिहार ही और देश में ही नही  दूनिया में मोदी का जादू चल गया है .
प्रधानमंत्री के रूप में जिस गरिमा के साथ मोदी नए रूप में अवतरित हुए है उसे बनाये रखने के लिए मोदी को अनेक अडचनों को पार भी करना होगा . खुद उनकी ही पार्टी और उनके हिन्दू वादी संगठनों के गैर जरुरी बयानों पर लगाम लगाना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी . संविधान में परिवर्तन नही होगा ये कह कर उन्होंने ये सन्देश तो दे ही दिया है कि वे राजनैतिक तौर पर किसी पार्टी के सदस्य हो सकते है मगर प्रधानमंत्री तो देश के ही  है और ऐसे देश के जिसमे सवा अरब  लोग रहते है और भी  विभिन्न धर्म और पंथ को मामने वाले .
 श्याम यादव



सामयिकी क्यों ?

 सामयिकी एक विचार अभिव्यक्ति का माध्यम है जो देश के हालत पर हम आपके लिए लाये है . देश दुनिया के तमाम हालतों पर समय समय अप आप से रूबरू हो कर ये विचार आप तक पहुँचते रहेंगे . आप  की राय हमारे लिए जरुरी है ..... युवान